नारी शशक्तिकरण और उसके प्रारूप.

मातृशक्ति का भारत निर्माण एवं विकास में सदैव विशेष योग दान रहा है| हमारी संस्कृति में मातृशक्ति को हमेशा एक गोरव पूर्ण स्थान दिया है |

पुरातन काल से ही हमारे यहाँ राज दरबार में राजा के साथ साथ रानियों को स्थान दिया जाता रहा है यहाँ तक की कार्य वयवस्था में उनकी अहम् भागीदारी रही है |

चाहे वह युद्ध के समय राजा दशरथ के साथ कैकयी का जाना हो या फिर माँ जीजा का शिवाजी के जीवन में एवं राज काज में प्रभाव | ऐसे अनेक उदहारण हमारे यहाँ आपको देखने को मिल जायंगे |

भारत  विश्व का एक मात्र स्थान है जहा सविंधान के  प्रथम दिन से नारी शक्ति को पुरुस के साथ मताधिकार दिया | विपरीत इसके विश्व के कई देशो में इसके लिए आन्दोलन हुए |

ये सब भूमिका मैं इसलिये बना रहा हूँ क्यों की हमारी परंपरा के इतने वर्षों बाद भी समाज में नारी सशक्तिकरन की कमी महसूस हो रही है | लोग नारी सशक्तिकरन में हमें पिछाडा मानते हैं |

इसके कई कारण हो सकते है :  हो सकता है ये हमारी वास्तिविकता हो या हो सकता है की हमने इसकी परिभाषा समय के साथ बदल दी हो , या फिर सामाजिक ढांचे में कोई दोष है |

अपनी बात रखने से पहले मैं यहाँ स्पष्ट कर देना चाहता हूँ की मैं किसी भी तरह की जीवन शैली का विरोधी नहीं हूँ न ही किसी शैली का पक्षधर | जीवन शैली व्यक्ति के पारस्परिक वातावरण पर निर्भर करती  है अतः उस पर विरोधाभास होना स्वाभाविक हो सकता है पर प्रायोगिक नहीं |

तो जैसा की हम चर्चा कर रहे थे की कही नारी सशक्तिकरन की परिभाषा तो नहीं बदल गयी है |

जहाँ तक मैं सशक्तिकरण का मतलब समज पाया हूँ उसका अर्थ है की शक्ति प्रदान करना , समर्थ बनाना |

अब सशक्तिकरण कई प्रकार से हो सकता है जैसे शारीरिक मानसिक आर्थिक आदि आदि | साथ में ही सशक्तिकरण की दिशा भी इस पर निर्भर करती है की जो सशक्तिकरण किया जा रहा है वो सही दिशा में काम कर रहा है या नहीं | जैसे आप एक सेना को सशक्त करते है जो आपके देश की रक्षा करती है दूसरी तरफ आप एक आतंक को सशक्त करते है जो विनाश की बात करता है | इसमें गौर करने वाली बात ये है की सशक्तिकरन का तरीका भला ही समान हो पर गन्तव सामान नहीं रहा है अर्थात सशक्तिकरण का गलत उपयोग समाज के लिए दुस्प्रभावी हो सकता है |

अब बात करते है महिला सशक्तिकरण की तो आज़ादी के बाद से ही या जैसे की हमने पूर्व में विचार किया हमारी संस्कृति के प्रारम्भ से ही हमने महिला सशक्तिकरण पर पूरा बल दिया है |

सरकार ने महिला उत्थान के लिए कई योजनाये बनायीं हैं जैसे:

इंदिरा गांधी मातृत्व सहयोग योजना सशर्त मातृत्व लाभ योजना (IGMSY-सीएमबी), 2010

किशोरियों के सशक्तिकरण के लिए राजीव गांधी योजना – सबला (आरजीएसईएजी), 2012

राष्ट्रीय महिला कोष (रंक), १९९३

महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए राष्ट्रीय मिशन अदि

इन सभी के मूल में नारी को समाज में विशेष स्थान और सबल प्रदान करने का प्रयास किया गया है,

और हम देखते है की इन सब प्रयासों के फलस्वरूप आज देश की महिलाये लगभग हर क्षेत्र में एक अहम् हिस्सा बनी हुई हैं चाहे वह सेना हो खेल कूद हो विज्ञानं हो या कला |

परन्तु दुर्भाग्य यहाँ यह है की हमारे यहाँ महिला सशक्तिकरण का दायरा सिमित हो रहा है , लोग महिलाओ के पहनावे, रहन सहन और जीवन शैली से महिला सशक्तिकरण की बात करते हैं |

महिला सशक्तिकरण की आड़ में हम कई बार व्यर्थ की मांगों को मनवाने का प्रयत्न कर अपना अधिकार मानते हैं |

एक बार देश के रक्षा मंत्री से किसी ने पूछा की महिलाओ को आप सेना में फ्रंट लाइन में क्यों नहीं रखते क्या महिलाये पुरूषों से कमजोर हैं , तो उनका जवाब था नहीं, पुरषों से कीमती हैं | सोचो अगर लड़ाई के दोरान किसी महिला को युद्ध बंदी बना लिया जाये तो क्या होगा |

तो इस तरह की अनेको बाते हैं जिनका अकसर गलत मतलब निकल कर हम एक नयी बहस को जन्म दे देते है की ये अधिकार क्यों नहीं है |

आज कल सिर्फ कामकाजी महिला को ही सशक्त माना जाता है परन्तु इसका अभिप्राय यह नहीं होना चाहिए की घरेलु महिलाये सशक्त नहीं है |

बचपन में हम देखते थे की पिताजी माताजी को घर खर्चा दिया करते थे और माता जी को इस तरह वो सशक्त बनाते थे सम्पूर्ण परिवार की जिम्मेदारी दे कर  , अब इस पर कुछ लोग आपत्ति करंगे की माता जी तो पिताजी पर निर्भर हो गयी हैं तो मैं बताना चाहता हूँ की यहाँ माता जी के साथ साथ पिताजी भी माताजी पर निर्भर थे .

यही महिला सशक्तिकरण है की महिला पुरुष एक दुसरे के पूरक हैं , विपरीत नहीं प्रतिद्वंदी नहीं |

परन्तु आज के समय में हम देखते है की जो प्रयास एक दुसरे को पूरक बनाकर देश को बढ़ाने के लिए थे वो अब प्रतिद्वंदता बन गए हैं |

वास्तिवकता में महिला को संबल प्रदान करना चाहे वो किसी भी क्षेत्र में हो माहिला सश्कातिकरण हैं | अभी कुछ दिन पहले एक प्रसिद्ध अभिनेत्री ने कहा की उन्हें पुरुष सिर्फ बच्चा पैदा करने के लिए चाहिए क्या अब आप इसे महिला सशक्तिकरण कहंगे ?

इन सब से समाज में एक गलत वातावरण बन रहा है जो महिला सशक्तिकरण की आड़ में महिला एकाकीकरन कर रहा है जो की सबल समाज के लिए सही नहीं है | जैसा की हमने पूर्व में कहा की महिला सशक्तिकरण से हमें महिला पुरुष को एक दुसरे का पूरक बनाना है न की प्रतिद्वंदी |

हमें महिला अधिकारों की रक्षा करनी है परन्तु इस तरह से नहीं को वो एकाकीकरन की रह पर चल पड़े|  इसी एकाकीकरण की बढती परवर्ती के कारण विवाह विच्छेद में हम एक नया आयाम कायम कर रहे हैं |  आज कल की बढती परवर्ती में हम देखते हैं की एक वाक्य बड़े चलन में है, मैं आपके काम में दखलंदाजी नहीं करुँगी आप मेरे में मत करो | इन विषयो के आने से समाज में अस्वस्थता का अनुभव होता है |

मैं यह नहीं कहता की पुरुष या स्त्री दोनों को परस्पर बेहिचक रोक टोक करनी चाहिए, हाँ जरुरत से जायदा रोक टोक कई बार आपके स्वतंत्र अस्तित्व को ख़राब लगती है परन्तु हर सलाह को रोक टोक समझान भी सामाजिक ढांचे के लिए ठीक नहीं है स्त्री पुरूष एक दुसरे एक पूरक हैं |

यहाँ मैं एक उदाहरण देता हूँ जब हम कोई भारी  सामान लिए चल रहे होते हैं तब अगर बीच में हमारे हाथ से वो छूटने वाला होता है तो स्वत ही दूसरा हाथ सहारा देने आता है | अब सोचो वो हाथ जिसका अपना स्वतंत्र अस्तित्व है अगर सहारा न दे और आज की भाषा में कहे टोके ना दुसरे हाथ को, तो सामान गिर जायेगा यही स्त्री पुरूष सम्बन्ध पर भी लागू होता है |

अब सवाल इस बात का अत है की सदियों पुरानी हमारी नारी सशक्तिकरण की परम्परा होने के बावजूद  आज भी नारियों पर अत्याचार क्यों बढ़ रहे हैं | नित नित बलात्कार शोषण के मामले सामने आ रहे हैं |

तो इसका अभिप्राय यह भी है की महिला सशक्तिकरण में सरकार या समाज की तरफ से कमी तो है

परन्तु कमी कहाँ है सरकार की योजना में या उसके किर्यान्वयन में, तो शायद हम पायंगे की योजनायें तो बहूत हैं  परन्तु उनसे कोई विशेष प्रभाव नहीं हुआ |

इसका कारन है की हम समाज में इसको प्रभावशाली तरीके से लागु नहीं कर पाए | आज भी बहूत से क्षेत्रों में महिला शोषण है, कई जगह तो पुरुष आज भी नारी पर अत्याचार करते हैं और नारी सहज भाव से उसे पुरुष का अधिकार बता कर बर्दाश्त कर लेती हैं, तो अब इस विचारधारा को बदलना होगा जैसे हमने कहा की पुरुष और नारी एक दुसरे के पूरक हैं कोई किसी पर प्रभावी नहीं है |

मैंने एक चर्चा में पूछा की क्या किया जाये की ये  रुक जाये तो आप मानिये ज्यादातर महिलाओ ने इसमें यही कहा की ज्यादातर लड़कियाँ केस नहीं करती हैं और नारी नारी का हित नहीं सोचती हैं | अब मैं पूछना चाहता हूँ की क्या केस करने से ये समस्याए हल हो जाएगी शायद नहीं जहाँ हज़ार केस आते हैं उनकी संख्या ४ हज़ार हो जायगी परन्तु समस्या हल नहीं |

रही बात नारी का नारी को साथ देने की तो मैं मानता हूँ की नारी को नारी समस्या के लिए खड़ा होना चाहिए परन्तु ये इसका पूर्ण हल नहीं होगा |

तो इसका हल कैसे होगा इसके लिए हमें समाज के वैचारिक ढांचे में परिवर्तन लाना होगा परन्तु उन महिलों का मानना था की किसी के विचार बदलना आसान नहीं है | माना आसान नहीं  है पर जरुरी है|

देश के युवा शक्ति को यही करना हैं समाज में जागरूकता लानी हैं बताना है और समय समय पर संगोष्ठी कर नारी सशक्तिकरण की सही परिभाषा रखनी है हमें समाज में ये स्थापित करना होगा की यत्र नार्यस्तु पूजयते रमन्ते तत्र देवताः |

समय समय पर देश के पिछड़े क्षेत्रों में जाकर लोगो जागरूक करना होगा | विद्यालयों में जाकर विधार्थियों को नारी महिमा और उसके सम्मान के बारे में समझाना होगा | जिस से समाज में आधार से ही नारी को सबल मिल सके |

कुछ गलत धारणाओं को सही करना होगा की गाँव के खेत में मेहनत करने वाली महिला शहर की आधुनिक महिला से इसलिए कम सशक्त है की उसकी जीवन शैली आधुनिक नहीं है अपितु  उसे समाज में पूर्ण सम्मान और अधिकार मिल रहे है |

जो ये वैचारिक मतभेद हैं इनको कम करना होगा उसे समझाना होगा की वह भी सबल है उसे भी वही अधिकार और सम्मान हैं

कहीं अगर समाज में पुरुष अपने को नारी से कहीं श्रेष्ठ मनाता है तो वहां भी हमें उसे समझाना होगा की कोई किसी से श्रेष्ठ नहीं अपितु पूरक हैं |

वरना सरकार की नीतियाँ आती रहेंगी पर समाज में जागरूकता के आभाव के कारन उनका क्रियान्वयन सही से नहीं होगा और हम वहीँ पहुँच जायंगे जहाँ से ये यात्रा प्रारंभ हुई |

 

 

 

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